CBSE 12वीं बोर्ड परीक्षा में छाई नेत्रहीन लड़की, पढ़िए रश्मि की Success स्टोरी

जन्म से नेत्रहीन कोलकाता की एक लड़की ने नवीन तकनीक से सी.बी.एस.ई. 12वीं की परीक्षा देते हुए पहले ही प्रयास में 85.4 प्रतिशत कुल अंक प्राप्त किए हैं। 18 वर्षीय रश्मि मारूवाड़ा ने 10वीं तक की पढ़ाई पाठ भवन स्कूल में ब्रेल माध्यम से की। ब्रेल की मदद से नेत्रहीन पढ़ सकते हैं जिसमें अक्षरों तथा संख्याओं को उभरे हुए बिंदुओं के रूप में मुद्रित किया जाता है ताकि वे उन्हें छूकर पढ़ सकें। इस स्कूल में तिमाही तथा वार्षिक परीक्षाओं के लिए उसकी मां एक राइटर का इंतजाम करती थीं जिसे रश्मि बोल कर उत्तर लिखवाती थी। क्लास टैस्ट के उत्तर वह ब्रेल में देती थी जिसे सोसायटी फॉर द विजुअली हैंडीकैप्ड का एक व्यक्ति कागज पर लिख देता था।

नए सॉफ्टवेयर से मिली मदद
10वीं कक्षा के बाद रश्मि ने ए.पी.जे. स्कूल पार्क स्ट्रीट में दाखिला लेकर आर्ट्स स्ट्रीम का चयन किया, जहां एक नवीन तकनीक ने उसके लिए एक नई राह खोल दी। नोट्स लेने के स्थान पर वह रिकॉर्डर का उपयोग और लैपटॉप पर एक विशेष सॉफ्टवेयर की मदद से प्रोजैक्ट्स तैयार करने लगी। इससे उसे किसी की मदद की जरूरत नहीं रही क्योंकि अब वह बोल कर लैपटॉप पर कुछ भी कर सकती थी। रश्मि के अनुसार ‘जॉज’ (जे.ए.डब्ल्यू.एस.-जॉब एक्सैस विद स्पीच-स्क्रीन रीडर प्रोग्राम) ने उसे वह आजादी और आत्मविश्वास दिया जो पहले कभी उसने अनुभव नहीं किया था। उसने कहा, ‘‘इस तकनीक से परीक्षा लिखने तथा असाइनमैंट्स पूरे करने में मैं आत्मनिर्भर हो गई हूं।’’

12वीं बोर्ड परीक्षा में उसके अंक उसके आत्मविश्वास को स्पष्ट करते हैं- अंग्रेजी में 90, ह्यूमन राइट्स एंड जैंडर स्टडीज में 88, साइकोलॉजी तथा सोशियोलॉजी में 86 और लीगल स्टडीज में 77 अंक उसने प्राप्त किए हैं। वह कहती है, ‘‘चाहे पढ़ाई से जुड़ी चीजों को इंटरनैट पर सर्च करना हो या टीचर अथवा दोस्तों द्वारा भेजे दस्तावेज पढऩे हों, अब मैं ‘जॉज’ सॉफ्टवेयर का उपयोग करती हूं। मुझे प्रोजैक्ट्स के लिए केवल फोटो डाऊनलोड करने में मदद की जरूरत पड़ती है क्योंकि स्क्रीन रीडर फोटोज को पहचान नहीं सकता है। मुझे जिस प्रकार की फोटो की जरूरत होती है उसके बारे में मां को बताती हूं जो उन्हें सर्च करके डाऊनलोड कर देती हैं।’’
स्कूल के तीसरे दिन जब रश्मि को एहसास हुआ कि उसके एक शिक्षक उसकी खातिर बहुत धीमी गति से लैक्चर देते हैं तो उसने उन्हें कहा कि वह ऐसा न करें क्योंकि उसे लैक्चर सुनने और समझने में कोई दिक्कत नहीं है। यदि उसे कक्षा में पढ़ी कोई बात याद न आती तो रिकॉर्डर उसके बड़े काम आता जिसमें रिकॉर्ड हुए लैक्चर को वह कभी भी सुन सकती थी। स्कूल की प्रिंसीपल रीटा चटर्जी बताती हैं, ‘‘सी.बी.एस.ई. प्रणाली में कुछ प्रावधान हैं जिनसे 12वीं कक्षा की परीक्षा लिखने हेतु रश्मि के लिए कम्प्यूटर का उपयोग करने की अनुमति हम प्राप्त कर सके। वह बेहद दृढ़निश्चयी है। मैंने स्कूल में संगीत कार्यक्रम के दौरान मंच पर जाने के लिए मदद लेने से इंकार करते हुए भी उसे देखा है।’’

जब केवल एक वर्ष की थी तो रश्मि का कॉर्निया प्रत्यारोपण करने का प्रयास असफल रहा था। तब से उसकी मां अन्नपूर्णा यही चाहती थीं कि उनकी बेटी भी एक सामान्य जीवन जीए। अन्नपूर्णा एक स्पैशल एजुकेटर हैं और उन्होंने शुरूआत में ही फैसला कर लिया था कि उनकी बेटी नेत्रहीनों के लिए बने किसी विशेष संस्थान की बजाय आम बच्चों की तरह एक आम स्कूल में ही पढ़ेगी। रश्मि कहती है, ‘‘वह मेरे लिए एक संरक्षित जीवन नहीं चाहती थीं। उन्होंने जोर दिया कि मैं अपनी उम्र के अन्य बच्चों की तरह ही किसी आम स्कूल में जाऊं।’’

मिल चुका है अवार्ड
12वीं के बाद की पढ़ाई रश्मि कोलकाता से बाहर करना चाहती है जिसकी वह तैयारी कर रही है। 2010 में रश्मि को नैशनल इनोवेशन फाऊंडेशन-इंडिया की ओर से ऐसे कम्प्यूटरीकृत ट्राइसाइकिल के कांसैप्ट के लिए अवार्ड दिया गया था जो पहले से तय किए गंतव्य तक स्वयं पहुंच सकेगा। वैसे रश्मि का फोकस केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, वह ट्रैकिंग तथा राफ्टिंग भी करती है। उसने पर्वतारोहण का एक कोर्स भी किया है।

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